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    दोस्त की मां और मैं

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    नमस्कार दोस्तों, मैं राहुल आज आपके सामने अपने जीवन की एक सच्ची कहानी रखने जा रहा हूं। यह बात उस वक़्त की है, जब मैं बारहवीं पास करके कॉलेज की पढाई कर रहा था।


    उस समय मैं द्वितीय साल में था, और मैं पढाई में कोई बहुत खास नही था। अक्सर मैं और मेरे दोस्त अपने फालतू के समय में उसके घर पर जाकर आराम करते थे। उसका घर कॉलेज से पास में ही था।


    उसके घर में वो, उसकी एक बहन, और उसकी मां ही रहते है। उसके पापा ने उसकी मां से तलाक लिया हुआ है, तो वो दोनों अलग ही रहते है।


    मेरे उस दोस्त का नाम था विजय। हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे, हमेशा साथ में रहनेवाले। जब भी कॉलेज में कोई काम नही होता, तो हम जाकर उसके घर में बैठ जाते थे।


    अब तो उसके घरवाले मुझे अच्छी तरह से जानने लगे थे। कभी कभी वो कुछ काम से बाहर गया होगा, तो भी मैं जाकर उसके घर में बैठ जाता। उसकी बहन हमसे छोटी थी, वो अब बारहवीं में पढ़ रही थी।


    उसकी मां अब भी सजती-संवरती थी। उसकी मां दिखने में किसी हीरोइन सेकम नही लगती थी, पता नही उसके पति ने उसे क्यों छोड दिया।


    वहां कॉलेज के आसपास विजय की मां को लेकर बहुत सारी अफवाएं फैली हुई थी, लेकिन उसे हम कुछ नही कर सकते थे। एक दिन ऐसे ही दिन में मैं कॉलेज में बोर हो रहा था, तो विजय के घर चला गया।


    वो आज कॉलेज नही आया था, घर पर पूछने पर पता चला कि, वो तो किसी काम से पासवाले गांव गया हुआ है। घर में उस वक़्त सिर्फ उसकी मां ही थी। जब मैं वापस कॉलेज के लिए निकलने लगा, तो उसकी मां ने मुझे बुलाकर कुछ देर रुकने के लिए कहा।


    मैं भी उनकी बात मानकर रुक गया और अंदर जाकर टीवी देखने लगे गया। कुछ ही देर में आंटी मेरे लिए चाय लेकर आ गई, तो हम दोनों मिलकर चाय पीने लगे। चाय पीने के बाद, पता नही मुझे क्या होने लगा था?


    अचानक ही मेरे मन में चुदाई की इच्छा जागने लगी। मेरी हालत खराब हो रही थी, मुझे देखकर आंटी ने हंसते हुए मुझसे कहा, “क्या हुआ राहुल बेटा? सब ठीक तो है?”


    मैं उन्हें क्या कहता, मैंने उन्हें हां बोलकर अपना लण्ड छिपाने की कोशिश करने लगा। अपने आप ही मेरा लण्ड खडा होने लगा। मैंने जल्दी से चाय खत्म की, और घर से निकलने लगा।


    तभी आंटी मुझे रोकने का प्रयास करने लगी, और इतने में उनकी साडी का पल्लू हट गया। पल्लू हटते ही मेरी नजर सीधे उनके ब्लाउज में कैद हुए दो संतरों पर पडी, जो उसके ब्लाउज को फाडकर बाहर निकलने को बेताब थे।


    अब मुझे लगने लगा, आंटी ने ही चाय में कुछ मिलाया था। और मैंने तभी आंटी को अपनी बाहों में भर लिया। मैंने उसे जोर से अपने गले से लगाकर उसके होठों को चूमने लगा।


    आंटी भी मेरा साथ देने लगी, उसका मेरे होठों पर जीभ फिराते हुए चूमने का अंदाज मुझे पागल किए जा रहा था।


    तभी मैंने आंटी को रोकते हुए कहा, “आंटी, पहले दरवाजे और खिडकियां बंद कर दो। फिर तेरी चुत की शांति करूंगा। तेरे बारे में बहुत सुना है मैंने।”


    तो आंटी कहने लगी, “अब तो आंटी मत बोल, जान बोल मुझे। जा जल्दी से दरवाजा बंद करके आ और चोद दे अपनी जानू को।”


    मैं दरवाजा बंद करने लगा, तब तक आंटी ने खिडकियां बंद कर दी। अब पूरे घर में हम दोनों ही थे। अब विजय की मां मुझे सीधा अपने कमरे में ले गई। और अंदर जाते ही उसने सबसे पहले मेरे कपडे उतार दिए।


    मेरे कपडे उतारने के बाद, उसकी नजर मेरे लण्ड पर जाते ही उसने उसे अपनी हथेली में कैद कर लिया। अब वो नीचे घुटनों के बल बैठ गई, और मेरे लण्ड को अपने मुंह में भरकर गपागप चूसने लगी।


    बीच बीच में वो मेरे टट्टों को भी अपने हाथ से सहला देती। उसने चूस-चूसकर मेरा लण्ड पूरी तरह से गिला कर दिया था। अब मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके कपडे उतारने लगा।


    उसने कुछ ज्यादा पहना ही नही था, ना ब्रा पहनी थी, और न ही पैंटी। साडी के बाद ब्लाउज उतारते ही उसके दोनों उरोज मेरी आंखों के सामने नंगे थे।


    उसके नंगे उरोजों को मैंने अपने मुंह में भरकर चूसते हुए, नीचे हाथ लाकर उसके पेटीकोट का नाडा भी खोल दिया। अब मैं पूरी तरह से उसके ऊपर आ गया था, और उसके चुचियों को चूसकर लाल किए जा रहा था।


    धीरे धीरे मैं नीचे की ओर बढते हुए उसके शरीर के हर हिस्से को चूम रहा था। जब मैं उसकी चुत के पास पहुंचा, तो उसकी चुत की खुशबू मेरे नथुनों में फैल गई।


    अब मैंने सीधे अपने होंठ उसकी चुत पर रखते हुए उसकी चुत में अपनी जीभ घुसाने की कोशिश करने लगा। थोडी ही देर में उसकी चुत अच्छी तरह से गीली हो गई, तो अब मैंने देर न करते हुए उसके उपर चढते हुए अपने लण्ड को उसकी चुत में उतार दिया।


    सच में उसकी चुत का पहले से ही भोसडा बना हुआ है। मुझे अब लगने लगा, जो भी इसके बारे में लोग बोलते है, सच ही है। खैर मैं अपना लण्ड उसकी चुत में उतारकर जोरदार तरीके से उसकी चुदाई करने लगा।


    तभी आंटी मुझे बोली, “राहुल पिछले महीने मैंने गलती से तेरे लण्ड को देख लिया था, तब से यह चुत इसे लेने के लिए तडप रही थी। आज मौका देखकर मैंने तुझे अपना बना ही लिया।”


    मैंने उसकी बातों पर ध्यान न देते हुए उसे चोदना जारी रखा। अब मुझे वो किसी रंडी से कम नही लग रही थी। कुछ देर बाद, मैंने उससे पोजिशन बदलने के लिए कहा, तो वो उल्टी होकर लेट गई।


    मैंने उसकी दोनों टांगे फैलाकर उनके बीच में आते हुए अपने लण्ड को हाथ मे पकड लिया। लण्ड से अब मैं उसके चूतड़ों पर मारने लगा।


    फिर मैंने लण्ड को उसके पीछे से चुत पर रखकर एक ही धक्के में अपना पूरा लण्ड उसकी चुत में उतार दिया। अब मैं पीछे से उसकी चुत मार रहा था। मैंने एक तकिया लेकर उसकी कमर के नीचे रख दिया, जिससे उसकी गांड थोडी ऊपर को उठ आए।


    मेरे ऐसा करते ही वो आने घुटनो के बल खडी हुई और अपने हाथ आगे बिस्तर पर रखकर झुक गई। अब वो डॉगी स्टाइल में अपनी चुत मरवाना चाहती थी।


    मैंने भी उसके चुतडों को सहलाते हुए पहले एक-दो चांटे लगाते हुए, अपने लण्ड को उसकी गांड की दरार में रगडने लगा। जब उसके चूतड पूरी तरह से लाल हो चुके थे, तब जाकर मैंने अपने लण्ड को उसकी चुत पर रखा।


    फिर मैंने नीचे झुककर उसकी दोनों चुचियों को अपने हाथ में पकड लिया। अब उसकी चुचियों को पकडकर मसलते हुए मैं उसकी चुत में अपना लण्ड अंदर बाहर कर रहा था। इस पोजीशन में मेरे लण्ड को बहुत मजा आ रहा था।


    अब तक वो एक बार झड चुकी थी, और अब मैं भी आने वाला ही था। मैंने उससे पूछा, “अपना माल कहां निकालूं?”


    इस पर उसने कहा, “मेरी चुत में ही निकाल दे, लण्ड पूरा अंदर डालकर वीर्य निकाल।”


    यह सुनकर अब मैं पूरी तरह मस्त होकर जोर जोर से उसे धक्के मारने लगा। अगले चार-पांच धक्कों में मैं उसकी चुत में ही झड गया।


    फिर कुछ देर तक हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे। फिर आंटी ने खुद उठकर हम दोनों को साफ किया और फिर एक बार चुदाई का दौर चल पडा। इस बार मेरा लण्ड झडने का नाम ही नही ले रहा था।


    आखिर में आंटी को चूसकर मेरे लण्ड का पानी निकालना पडा। जब कपडे पहनकर मैं घर से बाहर निकला, तो वहां विजय की बहन खडी थी। वो भी मेरी तरफ देखकर हंसने लगी। मैंने ध्यान न देते हुए सीधा अपने घर निकल आया।


    आपको मेरी यह कहानी कैसी लगी, हमें कमेंट करके जरूर बताइए। धन्यवाद।

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