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    मेरी दिलेरी पर फिदा

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    Antarvasna, Kamukta घर में गरीबी की स्थिति थी हम लोग एक छोटे से गांव के रहने वाले हैं जहां पर रोजगार का कोई साधन नहीं है हम लोगों का गांव पटना से 200 किलोमीटर दूर है वहां पर कोई रोजगार का साधन ना होने की वजह से मुझे पटना आना पड़ा। घर में मैं ही काम करने वाला था मैंने अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद मैं पटना चला आया मेरी ऊपर मेरे तीन बहनों की शादी की जिम्मेदारी थी और सब कुछ मेरे कंधों पर ही था। मेरे पिताजी अब बुजुर्ग हो चुके थे वह काम भी नहीं कर पाते थे इसलिए वह अब घर पर ही रहने लगे थे मैं जितना भी कमाता था वह सब मैं घर पर दे दिया करता मैंने कभी भी अपने बारे में नहीं सोचा मैं अपने परिवार के सदस्यों की ही जरूरत पूरी करने में लगा रहा मैंने उनकी खुशी में कोई कमी नहीं रखी।


    मैं अपनी मां के बैंक अकाउंट में पैसे भेज दिया करता था और पटना में मैं जिस फैक्ट्री में काम किया करता था वह फैक्ट्री भी बंद होने की कगार पर थी क्योंकि जो व्यक्ति उस कंपनी को चलाता था उसके ऊपर बैंक का काफी खर्च हो चुका था और फैक्ट्री कुछ ही समय बाद बंद होने वाली थी। मुझे दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी लेकिन जैसे कैसे मुझे तनख्वा मिली उसके कुछ ही समय बाद मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी और मैं अपने गांव लौट के आया। जब मैं अपने गांव लौटा तो मेरे पास थोड़े बहुत पैसे थे वह मैंने अपनी मां को दिये और कहा इन्हें अपने पास रख लो लेकिन मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं क्योंकि मैं ना तो पढ़ा लिखा हूं और ना ही मेरे पास इतना पैसा है कि मैं अपना ही कोई कारोबार खोल सकूं मैं बहुत ज्यादा परेशान रहने लगा। मेरे चाचा गाजियाबाद में ड्राइवर हैं उन्होंने मुझे कहा तुम मेरे साथ गाजियाबाद चलो मैंने उन्हें कहा लेकिन चाचा मैं वहां पर क्या करूंगा चाचा कहने लगे तुम मेरे साथ चलो मैं कोई ना कोई बंदोबस्त तुम्हारे लिए कर दूंगा तुम बिल्कुल भी चिंता ना करो।


    मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था और मैंने अपने चाचा के साथ जाने का फैसला कर लिया क्योंकि मेरे पास और कोई दूसरा रास्ता नहीं था इसलिए मुझे अपने चाचा के साथ ही गाजियाबाद जाना पड़ा। मैं अपने जीवन में पहली बार ही गाजियाबाद गया था मेरी उम्र 27 वर्ष है और जब मैं गाजियाबाद पहुंचा तो मैंने देखा कि मेरे चाचा को एक छोटा सा कमरा था मै भी उनके साथ ही रहने लगा मेरी चाची भी गांव में रहती हैं। चाचा जी को गाजियाबाद में काम करते हुए काफी समय हो चुका है वह मुझे कहने लगे राघव बेटा अब तुम यही काम करना और खूब अच्छे पैसे कमाना मैंने चाचा से कहा चाचा मैं मेहनत करने से कभी नहीं कतराता लेकिन आज तक कभी ऐसा मौका ही नहीं मिला। चाचा जी ने मेरे लिए एक फैक्ट्री में बात कर ली थी वहां पर शर्ट सिलने का काम होता था इसलिए मैंने वहां पर ही काम करना ठीक समझा मैंने उस फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया और मुझे वहां काम करते हुए दो महीने हो चुके थे। मुझे तनख्वाह समय पर मिल जाया करती थी मैं अपनी आधे से ज्यादा तनख्वा अपने घर भेज दिया करता था क्योंकि घर में मैं ही काम करने वाला था इसलिए मुझे ही घर की सारी जिम्मेदारी उठानी थी। अब सब कुछ ठीक चल रहा था मैं जिस कंपनी में नौकरी करता था वहां पर मुझे तनख्वाह समय पर मिल जाती थी और मैं घर पर पैसे बिल्कुल सही समय पर भेज दिया करता था। एक दिन मेरी तबीयत खराब हो गई जब मेरी तबीयत खराब हुई तो मुझे कुछ दिनों के लिए आराम करना पड़ा मुझे नहीं मालूम था कि मेरी तबीयत इतनी ज्यादा खराब हो जाएगी कि मुझे एक महीने तक घर पर ही रुकना पड़ेगा। उसके बाद मुझे उस कम्पनी से भी निकाल दिया गया था मेरे पास कोई काम नहीं था मैं कुछ दिनों तक इधर-उधर भटकता रहा तभी मुझे एक जगह नौकरी मिली वहां पर मैं काम करने लगा। एक दिन मैं और चाचा बैठे हुए थे मैंने चाचा से कहा ना जाने कब तक हमारे साथ यह सब होता रहेगा कब तक हम लोग ऐसे ही मर मर कर जीते रहेंगे।



    चाचा कहने लगे बेटा हमेशा धैर्य रखना चाहिए जरूर तुम्हारे जीवन में सब कुछ ठीक होगा तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मैंने चाचा से कहा मुझे तो बिल्कुल भी उम्मीद नहीं है मुझे नहीं लगता कि कुछ ठीक होने वाला है इतने समय से हम लोग मेहनत करते आ रहे हैं लेकिन आज तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ जिससे कि हमारी गरीबी दूर हो पाए। मैंने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी मुझे कोई उम्मीद भी नहीं दिखी की कभी हमारे जीवन में खुशहाली आने वाली है हम लोग जैसे तैसे अपनी जिंदगी काट रहे थे परंतु शायद मेरे जीवन में कुछ और ही लिखा था मैं जिसके यहां नौकरी करता था वहां पर भी मैंने नौकरी छोड़ दी उसके बाद मैं घर पर ही खाली रहा। मेरे चाचा ने मुझे कहा बेटा तुम एक काम करो गाड़ी सीख लो और कहीं पर तुम ड्राइवरी कर लेना मैंने चाचा से कहा आप मुझे गाड़ी सिखा दीजिए चाचा मुझे गाड़ी सिखाने लगे और अब मैं गाड़ी सीख चुका था मैं एक घर में ड्राइवर की नौकरी करने लगा। मुझे रास्तों की ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन धीरे धीरे मुझे रास्ते भी पता चलने लगे। मैंने करीब वहां पर 6 महीने तक काम किया और उसके बाद मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी अब मैं जिस जगह नौकरी कर रहा था वह एक बहुत बड़े वकील थे और मैं उनके साथ ही ड्राइवर था। उनका नेचर और व्यवहार बहुत अच्छा था उनके परिवार में उनके दो बच्चे हैं उनके बड़े लड़के की उम्र मेरे जितने ही है और उनकी एक लड़की है जो कि कॉलेज में पढ़ती है वह बहुत ही घमंडी है मैं उससे कभी बात नही किया करता था।


    उसका नाम शीतल है मैं उससे बहुत कम बात किया करता था क्योंकि उसका नेचर मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं था वह हमेशा ही गुस्से में रहती थी और ना जाने कब वह किसे डांट दे इसलिए मैं उससे दूर ही रहता था। एक दिन मेरे मालिक ने कहा कि राघव आज तुम शीतल को उसके कॉलेज छोड़ देना मैंने उनसे कहा ठीक है सर मैं शीतल मैडम को कॉलेज छोड़ दूंगा उस दिन मैंने शीतल को कॉलेज छोड़ा। मैं जब उसे उसके कॉलेज छोड़कर वापस घर की तरफ आ रहा था तो कुछ लड़के उसे रास्ते में छेड़ने लगे मैंने यह सब देख लिया था और मैं जब गाड़ी मोड़ कर पीछे की तरफ गया तो मैंने उन लड़कों से कहा यदि कोई भी मैडम को हाथ लगाएगा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। शीतल शायद मेरी मर्दानगी पर फिदा हो गई और उसके बाद वह मेरी इज्जत करने लगी उसने उस वक्त मुझे कहा राघव तुम तो बहुत ज्यादा दिलेर हो मैं तो तुम्हें बहुत ही कमजोर समझती थी। उस दिन के बाद शीतल मेरी इज्जत करने लगी और हम दोनों के बीच दोस्ती हो गई मुझे यह बात मालूम थी कि हम दोनों के बीच कभी दोस्ती नहीं हो सकती और ना ही हम लोगों के बीच कभी समानता हो सकती है वह एक अच्छे घराने से है और मैं एक गरीब परिवार से हूं लेकिन उसके बावजूद भी शीतल ने मुझे कभी एहसास नहीं होने दिया। हम लोग जब भी मिलते तो वह हमेशा मुझे खुश करने की कोशिश करती मुझे नहीं मालूम कि उसके दिल में मेरे लिए किया था लेकिन मैं उसकी बहुत ही इज्जत करता था और अब वह भी मेरी इज्जत करने लगी थी। जब भी मुझे मेरे साहब कहते कि तुम शीतल को उसके कॉलेज छोड़ दो तो मैं शीतल के साथ काफी अच्छा समय बिताया करता था और एक दिन ऐसा ही हुआ उन्होंने मुझे कहा तुम शीतल को कॉलेज छोड़ देना और उसे कॉलेज से वापस ले आना। उस दिन शीतल का एग्जाम था, मैंने उसे कॉलेज तक छोड़ दिया मैं कुछ देर बाहर ही रुका रहा जब शीतल का एग्जाम खत्म हुआ तो वह मुझे कहने लगी आज मेरा एग्जाम बहुत अच्छा हुआ है और मैं तुम्हें अपनी तरफ से एक पार्टी देना चाहती हूं।


    उनके कॉलेज के बाहर एक छोटा सा स्नेक पॉइंट है वहीं पर उसने मुझे बर्गर खिलाया मैं और शीतल एक साथ बात कर रहे थे शीतल मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी और मुझे उसे देख कर बहुत अच्छा लग रहा था। हम दोनों वहां से घर लौट आए लेकिन घर पर कोई नहीं था मैंने साहब को फोन किया तो वह कहने लगे मुझे किसी जरूरी काम से अपने दोस्त के घर आना पड़ा और हमारे साथ तुम्हारी मालकिन और संजय है संजय मेरे बॉस के लड़के का नाम है। शीतल और मैं घर पर अकेले थे शीतल मुझसे कहने लगी आओ मैं तुम्हें अपनी कुछ पुरानी तस्वीरें दिखाती हूं। वह मुझे अपनी कुछ पुरानी फोटो दिखाने लगी जब वह मुझे अपनी फोटो दिखा रही थी तो मेरे हाथ उसके स्तनों से टकरा रहे थे और मेरे अंदर एक अलग ही जोश पैदा हो रहा था। इस बात को शायद शीतल भी समझ चुकी थी वह मुझसे चिपकने की कोशिश करने लगी जब उसकी गांड मुझसे टकराती तो मेरे अंदर की उत्तेजना बढ़ जाती, मैंने भी शीतल के स्तनों को दबाना शुरू किया और उसे अपनी बाहों में ले लिया।


    वह मेरी बाहों में आ चुकी थी और हम दोनों ही अपने आप पर काबू ना कर सके हम दोनों ने एक दूसरे को बहुत देर तक किस किया। जब मैंने शीतल की चिकनी और सील पैक योनि में लंड घुसाया तो वह चिल्ला उठी उसकी योनि से खून निकलने लगा  उसके अंदर की उत्तेजना बढ़ने लगी और मेरा लंड भी उसकी योनि के अंदर बाहर होने लगा। उसकी योनि से खून का बहाव बहुत तेज हो रहा था वह बहुत तेज़ मादक आवाज मे सिसकिया ले रही थी उसकी सिसकियो से मेरे अंदर का जोश और ज्यादा बढ जाता। मैंने उसकी दोनों टांगों को खोलते हुए उसे बहुत तेजी से धक्के दिए मैंने उसे इतनी तेजी से धक्के दिए कि वह अपने आप पर बिल्कुल काबू ना कर सकी और वह झड़ गई। जब वह झड गई तो मेरा वीर्य पतन उसके 1 मिनट बाद शीतल की योनि में हो गया शीतल मुझे देख कर मुस्कुराने लगी और कहने लगी आज तुमने अपनी मर्दानगी को साबित कर दिया है। वह मुझे देखकर हमेशा खुश होती लेकिन हमारे बीच जो अमीरी और गरीबी की दीवार थी वह हमेशा ही आ जाती थी मैं अपने कदम पीछे कर लिया करता था।

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